Saturday, June 19, 2021

एहसास


कौन हो तुम, शायद एक एहसास

एहसास जो अपना सा लगता है, 

एहसास जिसे अपनाने का जी करता है, 

किसी बंधन में बांधने का नहीं, 

बस महसूस करने का जी करता है, 

हाथ थाम कर उड़ने का जी करता है। 


पाकीज़ा सी ये दोस्ती है

बचपन की मासूमियत है इसमें,

जवानी का अल्हड़पन,  

जूनून नहीं कोई, एक सधा हुआ समंदर है,

इसे कोई नाम कैसे दे दूं, 

इसे किसी सोच से कैसे बांध दूं,

एक एहसास है ये, जिसमें डूब जाने का जी करता है। 


इस एहसास से जब राब्ता हुआ, 

खुद पर फिर से यकीन हुआ,

नहीं जानती ये क्यों हुआ, 

सही हुआ या गलत हुआ, 

अब जो हुआ सो हुआ। 


देख कर उसे आंखों को सूकून मिलता है, 

वो तारों से भरे नीले आसमान सा सुकून,

कुछ उसकी सुनने, कुछ अपनी कहने का जी करता है,

कभी बस साथ गुनगुनाने का जी करता है,

समाज की सभी बंदिशों से परे,

सब कुछ भूल जाने का जी करता है,

एहसास का रूप होता है ये जाना नहीं था,

जब मुलाकात हुई तो कुछ देर तक माना नहीं था,

लेकिन इस एहसास ने जिंदगी को ऐसे छुआ है, 

धड़कने का एहसास फिर दिल को हुआ है। 


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