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Friday, September 27, 2019

शाम की लाली

अजब सा लाल रंग बिखरा है आसमान में
अजब सी ये लाली है
किसी के दिल से है निकली आग,
या है किसी की गुलाबी शाम का आगाज़,
ये तो तू ही जाने....

कोई खाली जेब लिए एक गुलाब से भी खुश है,
तो कोई पूरा गुलदस्ता पा कर भी है बदगुमान,
तेरे मन की किस तार को छेड़ रही है ये शाम, ये तो तू ही जाने
शाम की ये लाली तेरे लिए क्या लाई ये तो तू ही जाने,

पटरी पर धड़क धड़क चलती इस गाड़ी की रफतार,
इस शाम की ठंडी हवा के झोकों से गुलाबी होते गाल,
तू क्यों उठा रहा है इस शाम पर सवाल ये तो तू ही जाने,

अजब सा लाल रंग समेटे, ठहरा है सारा आलाम,
आसमान में हर तरफ बिखरे गुलाल की है सुर्खी,
मौज में उड़ते शांत सफेद बादल भी हैं यहां,
उखड़े उखड़े काले बादलों की टोली भी है वहां,
किस बादल के साथ तू चलेगे ये तो तू ही जाने,
किस बादल पर है तुझे विश्वास ये तो तू ही जाने,

हथेली भले ही आज खुशक है, बारिश की नमी से भरी है आखें,
क्या इसलिए शाम की लाली को देख मन बेकरार है?
जिंदगी के सुर्ख लमहों का हिसाब मांगती ये शाम,
ख्वाबों पर लालिमा की चादर बिछाती ये शाम,
क्या कहें किससे कहें, दिल के सब तारों को छेड़ गई ये शाम,
अजब सा लाल रंग बिखरा है आसमान में, अजब सी गुलाबी है ये शाम। 

Friday, April 19, 2019

मुंबई - सपनो की नगरी


कैसा शहर है ये ?
ना सोता है, न थकता है !
सूबह के 6 बजे भी गाड़ी से गाड़ी सट कर चलती है
रात 12 बजे भी कारों और ट्रकों की भीड़ सड़क पर होती है।

जिंदगी यूं सड़क पर घंटे धव्सत कर रही है,
सांसे मानो जीने को झगड़ रही हैं,
रोज यहां आदमी खर्च हो रहा है।
रुह सागर की मटमैली लरहों में खुद को डुबो रही है।

लोगों के हुजूम में भी यहां दिल घबराता है,
भीड़ में भी मन अक्सर खुद को अकेला पाता है।
कैसा शहर है ?
ये न सोता है, न थकता है!

सीमेंट की राहें यहां आग उगलती हैं,
AC की नकली हवा गला सुखाती है।
उंची उंची इमारतों में कैद है इंसान
धरती और हक्कीत से बिलकुल परे।

कैसा शहर है ये ?
कहीं जिंदगी धक्के खा रही है,
कहीं सजी संवरी लहरा रही है,
दोनो ही अपना अपना सच छुपा रहे हैं,
बस धकापेल में चले जा रहा हैं।

कैसा शहर है ये ?
कैसा शहर है ये ?